Authors : डॉ. निभा रानी
Page Nos : 167-171
Description :
भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में पिछले तीन दशकों के दौरान निजी संस्थानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक हो गई है। वर्ष 1991 के आर्थिक उदारीकरण के पश्चात, भारत सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में निजी निवेश को प्रोत्साहित करने वाली नीतियां अपनाईं। इसके परिणामस्वरूप देश में अनेक निजी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना हुई। इन निजी शैक्षणिक संस्थानों ने न केवल शिक्षा के प्रसार और तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता में वृद्धि की है, बल्कि उद्योग-उन्मुख और रोजगारपरक पाठ्यक्रमों के विकास में भी अतुलनीय योगदान दिया है।
हालाँकि, निजी संस्थानों के इस तीव्र विस्तार के साथ-साथ कई गंभीर चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं। इनमें प्रमुख रूप से शिक्षा का बढ़ता व्यवसायीकरण , सामाजिक असमानता में वृद्धि और शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने जैसी समस्याएँ शामिल हैं।
अध्ययन का उद्देश्य और पद्धति:
इस शोध अध्ययन का मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी संस्थानों के प्रभाव का एक विस्तृत और आलोचनात्मक विश्लेषण करना है। इस शोध के प्रामाणिक निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए लगभग 50 विशिष्ट उदाहरणोंध्संस्थानों को नमूने के रूप में चुना गया है। प्रारंभिक विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि जहाँ निजी संस्थानों ने उच्च शिक्षा के अवसरों और पहुँच को बढ़ाया है, वहीं उच्च शिक्षण शुल्क के कारण समाज के आर्थिक रूप से कमजोर और पिछड़े वर्गों के छात्रों के लिए इन संस्थानों तक पहुँच आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।