Authors : सरोज शुक्ला
Page Nos : 179-181
Description :
उच्च शिक्षा किसी भी राष्ट्र के प्रगति का आधार स्तंभ होती है । वैश्विक परिप्रेक्ष्य में केवल ज्ञान प्राप्त करना काफी नही है,बल्कि ऐसी शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता है जो राष्ट्र में सतत विकास का आधार बने क्योंकि शिक्षा के बिना सतत विकास की कल्पना ही नही की जा सकती है। शिक्षा ही समझ में सकारात्मक परिवर्तन लाने में समर्थ है । सतत विकास का अर्थ ऐसे विकास से है जो वर्तमान पीढ़ी की जरूरत को पूरा करे परंतु भविष्य की पीढ़ियों के संसाधनों एवं उनके अधिकारों को प्रभावित न करे।
एलेन-ने अपनी पुस्तक ”हाउ टू सेव द न्यू वर्ड” में लिखा है “सतत विकास वह विचार और प्रयत्न है जिसके द्वारा विभिन्न जीवों एवं पारिस्थितिकीय व्यवस्थाओं का ऐसे ढंग से उपयोग किया जाता है,जिससे व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए उनका अस्तित्व अनिश्चितकाल तक बना रहे”।
सतत विकास का प्रारंभ तो वैदिक काल से ही हो चुका था वैदिक काल में ऋषि- मुनियों की चिंतन धारा में ही संपूर्ण विश्व का विकास निहित था उस समय के तत्व ज्ञाताओं ने
‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दुख भाग् भवेत्’ ।।
कहकर सर्वदा सभी के कल्याण की भावना व्यक्त कर दी थी। वह समय यज्ञ कर्म -काण्ड आदि का समय था। यज्ञ आदि के माध्यम से चतुर्धा वातावरण शुद्ध रहा करता था परंतु मध्यकाल आते-आते लोगों की यज्ञीय भावनाएं न्यून होने लगीं और विज्ञान एवं तकनीकि को बढ़ावा मिलने लगा फलस्वरुप पर्यावरणीय दोहन में तीव्रता आई जिसके कारण जलवायु परिवर्तन ,ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि, अनवीकरणीय ऊर्जा में गिरावट आदि होने लगी।
जिससे आधुनिक समय के भविष्यवेत्ताओं की चिंता बढ़ने लगी कि पर्यावरणीय सुरक्षा कैसे की जाए इसी भविष्य को सुरक्षित करने के लिए 1972 ई. में स्टॉकहोम में ‘वैश्विक पर्यावरण नीति की नींव रखी गई’।
वर्तमान समय में विकास का अर्थ केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित न रहकर सामाजिक, वैज्ञानिक, पर्यावरणीय आदि में संतुलन स्थापित करना है।